भगवान शिव ने जब मां दुर्गा की स्तुति की और पूछा कि हे मां इस संसार का कल्याण करने वाली तुम ही हो,तुम ही सबकी रक्षक हो,तुम ही भक्त वत्सला हो,हे देवी मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए कोई उपाय हो,तो बताओ,तब मां दुर्गा ने कहा कि आपने जगत कल्याण के लिए यह पूछा है,तो मैं बताती हूं।सबसे सरल उपाय है-अम्बा स्तुति।यह अम्बा स्तुति ही मां दुर्गा का पाठ है,जिसे करने से सभी प्रकार के कल्याण प्राप्त होते हैं और तन,मन व धन की समस्याओं से मनुष्य निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है।मंत्रों के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं।इनका कथन है कि मंत्रों के बिना औषधि सूखी लकड़ी के समान है।मंत्रों को जब तक निष्कीलन,उत्कीलन, शापोद्धार न किया जाए,ये काम नहीं करते हैं,क्योंकि भगवान शिव ने मंत्रों को कीलक द्वारा कीलित कर दिया है। मां दुर्गा के अद्भुत उत्कील दिव्य मंत्र पाठ से मृत्यु की कगार पर खड़े व्यक्ति स्वस्थ होकर महाशक्तिवान बन गए,हे पार्वती मैं यह पूर्ण सत्य कह रहा हूं और इससे बढक़र कोई सत्य नहीं है कि केवल महाब्रह्मर्षि ही दूसरों को तत्क्षण दुखों से मुक्त करके ब्रह्म ज्ञान दे सकता है।भगवान शिव,सुश्रुत, चरक,धनवंतरि व आयुर्वेद के सभी ग्रंथों में लिखा है कि दैवव्यपाश्रय विज्ञान के बिना औषधियां सूखी लकड़ी के समान हैं यह प्रमाणिक शास्त्रोक्त सत्य है इसे कोई झुठला नहीं सकता।दैवव्य विज्ञान के आगे पूरी दुनिया नतमस्तक है।करोड़ों लोग इसके माध्यम से अपने दुखोंए कष्टों से मुक्त हो गए हैं।ये उद्गार अनंतश्री विभूषित महाब्रह्मर्षि जगद्गुरु श्रीकुमार स्वामी ने रविवार को दोपहर 12 बजे विला कैमेलिया चाय फैक्टरी के पास पालमपुर में आयोजित समागम में श्रद्धालुओं से खचाखच भरे पंडाल में व्यक्त किए। महाब्रह्मर्षि ने अवधान के माध्यम से श्रद्धालुओं को तत्क्षण दुख निवारण की कृपा प्रदान की।समागम में नि:स्वार्थ जांच शिविर का आयोजन किया गया और नि:शुल्क औषधि वितरण भी हुआ।समागम में श्रद्धालुओं के अनुभव सुनकर वहां उपस्थित डाक्टर,वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी हैरान रह गए।समागम में सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों,धार्मिक संस्थाओं के विद्वानों,प्रशासनिक अधिकारियों व राजनीतिक क्षेत्र से संबंधित गणमान्य लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर प्रभु कृपा ग्रहण की।समागम में आए श्रद्धालुओं के लिए अनवरत रूप से लंगर चलता रहा।महाब्रह्मर्षि जगद्गुरु ने कहा कि भगवान शिव ने कहा है कि जो रोग किसी औषधि से ठीक नहीं होते,वह दैवव्यपाश्रय के प्रारूप से तैयार औषधियों से समाप्त हो जाते हैं और दोबारा नहीं होते। आयुर्वेद में भी इसका वर्णन है।

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