सोलन शहर के श्मशानघाट के लॉकर से एक महिला की अस्थियां गायब होने का मामला सामने आया है।घटना की सूचना मिलने के बाद जब पुलिस ने जांच शुरू की तो इसमें बड़ा खुलासा हो गया।जांच में खुलासा हुआ कि कोई और अपने पिता की अस्थियां समझकर उन्हें हरिद्वार में विसर्जित कर आया है।सोलन के लोअर बाजार के रहने वाले कमल की माता का 16 दिसम्बर को निधन हुआ था।उन्होंने अपनी माता का अंतिम संस्कार सोलन के चंबाघाट स्थित श्मशानघाट में किया।यहां पर अस्थियों को वह एक लॉकर के अंदर बंद करके चले गए और वीरवार को जब वह हरिद्वार जाने के लिए श्मशानघाट से अस्थियां लेने गए तो मौके पर पहुंचकर होश उड़ गए।उन्होंने देखा कि जिस लॉकर में उन्होंने अस्थियां रखी थीं,उसका ताला खुला है और अस्थियां नहीं थीं।ऐसे में वे परेशान हो गए कि आखिर उनकी माता की अस्थियां अब हरिद्वार कैसे पहुंचेंगी।मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्होंने इसकी सूचना भी पुलिस को दी।इसके बाद पुलिस ने भी मामले में जांच शुरू की तो खुलासा हुआ कि एक अन्य व्यक्ति के पिता का निधन भी 19 दिसम्बर को हुआ था और उन्होंने भी अस्थियां यहीं के एक लॉकर में रखी थीं।दरअसल सोलन में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो संस्कार के बाद अस्थियां रखने के लिए यहां पर नगर निगम द्वारा लाकर बनाए गए हैं,जिनकी चाबियां उस व्यक्ति को दे दी जाती हैं जिनके घर में किसी की मृत्यु हुई हो,ताकि वह अपने हिसाब से यहां से अस्थियां ले जा सके और बाद में चाबियाें को यहां पर तैनात नगर निगम के कर्मचारियों को सौंप दिया जाता है।जिस व्यक्ति के पिता की मृत्यु हुई थी वह अपने पिता की अस्थियां लेने पहुंचा और जो चाबियां उसके पास थीं,उनमें से एक चाबी उस लाकर के ताले पर लग गई जिसमें कमल पाल की माता की अस्थियां रखी थीं।इस पर वह अस्थियां लेकर हरिद्वार चला गया और उसने अपने पिता की अस्थियां मान कर वहां पर अस्थि विसर्जन कर दिया।जांच के बाद पता चला कि जिस व्यक्ति के पिता की मृत्यु हुई थी उसकी अस्थियां दूसरे लॉकर में यहीं पर पड़ी हैं।पुलिस ने दोनों पक्षों को बुलाया और मामले की पूछताछ की,जिसके बाद दोनों ही पक्षों ने पुलिस में किसी प्रकार का मामला दर्ज नहीं करवाया है।उनका कहना है कि यह पूरा मामला गलती के चलते हुआ है,ऐसे में अब इस व्यक्ति के पिता की अस्थियां सोलन में ही छूट गईं,जिनका दोबारा हरिद्वार जाकर विसर्जन करना पड़ेगा,जबकि कमल पाल ने अपनी माता की अस्थियों का विसर्जन चांदी की अस्थियां बनाकर हरिद्वार में किया।

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