
शिमला नगर निगम की महिला पार्षद द्वारा हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में दायर अपील पर माननीय न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया जाना यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस सरकार की नीतियाँ महिलाओं के हितों के विपरीत हैं।यह बात वर्ष 2022 के शिमला विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी संजय सूद ने जारी एक प्रेस बयान में कही।संजय सूद ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार द्वारा एक अध्यादेश पारित किया गया था,जिसके तहत महापौर और उप महापौर का कार्यकाल पाँच वर्ष करने का प्रावधान किया गया था। लेकिन यह अध्यादेश माननीय राज्यपाल महोदय की स्वीकृति न मिलने के कारण कानून नहीं बन सका और स्वतः ही निरस्त हो गया।अध्यादेश निरस्त होने के बाद अब महापौर और उप महापौर के पद रिक्त हो चुके हैं।उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में पूर्व में लागू अधिनियम ही प्रभावी माना जाना चाहिए,जिसके अनुसार महापौर और उप महापौर का कार्यकाल अढ़ाई-अढ़ाई वर्ष का होता है।महिला पार्षद द्वारा इसी संवैधानिक और कानूनी आधार पर हाई कोर्ट में अपील की गई,जिस पर न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए मामले की गंभीरता को स्वीकार किया है।

संजय सूद ने कहा कि यह विषय केवल प्रशासनिक नहीं,बल्कि महिला सशक्तिकरण और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार जानबूझकर स्थिति को उलझाए हुए है,ताकि महिलाओं को नेतृत्व का अवसर न मिल सके।उन्होंने कहा,“एक ओर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निरंतर महिलाओं के सशक्तिकरण,नेतृत्व और सम्मान की बात करते हैं,वहीं दूसरी ओर हिमाचल की कांग्रेस सरकार महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को दबाने का कार्य कर रही है।यह दोहरा चरित्र अब प्रदेश की जनता के सामने आ चुका है।संजय सूद ने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार वास्तव में महिलाओं के हित में होती,तो वह अध्यादेश के निरस्त होने के बाद तत्काल पूर्व अधिनियम के अनुसार अढ़ाई वर्ष के कार्यकाल को लागू करती और महिला आरक्षण का सम्मान करती।लेकिन सरकार की चुप्पी यह दर्शाती है कि उसकी मंशा महिला नेतृत्व को आगे लाने की नहीं है।उन्होंने मांग की कि हाई कोर्ट के संज्ञान को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार तत्काल पूर्व अधिनियम के अनुसार महापौर और उप महापौर पदों पर अढ़ाई-अढ़ाई वर्ष के कार्यकाल की प्रक्रिया शुरू करे,ताकि लोकतंत्र और महिला अधिकारों की रक्षा हो सके।
