शिमला के साथ लगते धामी के हलोग गांव में अचानक लोगों ने एक दूसरे पर पत्थर बरसाए।मौका था प्राचीन समय से चल रहे रहे पत्थर मेले का। शिमला शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर धामी के हलोग में पत्थरों का एक ऐसा मेला होता है,जिसे देखकर हर कोई दंग रह जाता है।वर्षों से यह परंपरा दिवाली के दूसरे दिन होती है।पत्थरों का यह मेला मंगलवार को शाम करीब चार बजे शुरू हुआ।हजारों की संख्या में लोग हलोग धामी के खेल चौरा मैदान में पहुंचे। फिर धामी रियासत के कंवर जगदीप सिंह पूरे शाही अंदाज में मेले वाले स्थान पर आए।
उनके आगमन के साथ ही मेला शुरू हो गया।यहां कटेडू और जमोगी घरानों के लोगों के पहुंचते ही दोनों तरफ से पत्थर बरसाने का सिलसिला शुरू हो गया। दोनों ओर से छोटे और बड़े पत्थर लगातार बरसाए गए। इस बीच जमोगी और फिर कटेडू के खूंद को पत्थर लग गया।उनसे खून निकलने लगा।करीब एक घंटे तक चले इस पत्थरबाजी का सिलसिला यहीं थम गया। मेला कमेटी के आयोजकों के साथ राजवंश के सदस्यों ने मेला स्थल के नजदीक बने भद्र काली माता मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की।माता को खून का तिलक लगाया गया।बता दें कि पहले यहां नर बलि दी जाती थी।मान्यताओं के अनुसार एक बार रानी यहां सती हो गई। इसके बाद से नर बलि को बंद कर दिया गया। फिर पशु बलि शुरू की गई। कई दशक पहले इसे भी बंद कर दिया। इसके बाद पत्थर का मेला शुरू किया गया।मेले में पत्थर से लगी चोट के बाद जब किसी व्यक्ति का खून निकलता है तो उसका तिलक मंदिर में लगाया जाता है।हर साल दिवाली से अगले दिन ही इस मेले का आयोजन धामी के हलोग में किया जाता है। नियमों के मुताबिक एक ओर राज परिवार की तरफ से जठोली,तुनड़ू और धगोई और कटेड़ू खानदान की टोली और दूसरी तरफ से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य ही पत्थर बरसाने के मेले भाग ले सकते हैं।बाकी लोग पत्थर मेले को देख सकते हैं,लेकिन वह पत्थर नहीं मार सकते।‘खेल का चौरा’ गांव में बने सती स्मारक के एक तरफ से जमोगी दूसरी तरफ से कटेडू समुदाय पथराव करता है।मेले की शुरुआत राजपरिवार के नरसिंह पूजन के साथ होती है।

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