भारतीय चित्रकला की महान परंपराओं में शामिल है कांगड़ा लघुचित्र कला:कविंद्र गुप्ता।

राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने कहा कि कांगड़ा लघुचित्र कला भारतीय चित्रकला की महान परंपराओं में विशिष्ट स्थान रखती है।पहाड़ी चित्रकला शैली की यह उत्कृष्ट अभिव्यक्ति इसे विश्व की श्रेष्ठ चित्रकला परंपराओं में स्थान प्रदान करती है,जिसका संरक्षण आवश्यक है ताकि हमारी समृद्ध संस्कृति और धरोहर भावी पीढ़ी तक पहुंच सके।राज्यपाल शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान,राष्ट्रपति निवास में आयोजित कांगड़ा लघुचित्रों में लोक और ग्राम्य जीवन का चित्रण:भारतीय देशज कला-परम्परा का परिप्रेक्ष्य विषय पर आधारित कला शिविर में निर्मित कृतियों की प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।संस्थान को इस शिविर के आयोजन के लिए बधाई देते हुए,राज्यपाल ने कहा कि संस्थान लंबे समय से उच्च स्तरीय शोध,चिंतन और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर बौद्धिक विमर्श का अग्रणी केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति,ज्ञान परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति इसकी प्रतिबद्धता सराहनीय है।

राज्यपाल ने कहा,‘भारत,विश्व की उन प्राचीन सभ्यताओं में से है जिसकी कला-परंपरा हजारों वर्षों से विकसित होती हुई आज भी जीवंत है।भारतीय कला ने समय के साथ अनेक रूप ग्रहण किए हैं,परंतु अपनी मौलिक पहचान को सदैव बनाए रखा है।हमारे कलाकारों ने ऐसे सृजन किए हैं जो पीढ़ियों को जोड़ते हैं और समाज को अपनी जड़ों से जोड़कर रखते हैं।श्री कविंद्र गुप्ता ने कहा कि कला-विधाओं को जीवित रखने में पारंपरिक कलाकारों का योगदान महत्वपूर्ण है।उन्होंने कहा कि जहां आज आधुनिकीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण अनेक पारंपरिक कलाएं चुनौतियों का सामना कर रही हैं,वहीं ये कलाकार हमारी सांस्कृतिक धरोहर के सच्चे प्रहरी बनकर सामने आते हैं।उन्होंने कहा कि जहां तक कांगड़ा लघुचित्र कला की बात है,तो यह कला भारतीय चित्रकला की महान परंपराओं में विशिष्ट स्थान रखती है।पहाड़ी चित्रकला शैली की यह उत्कृष्ट अभिव्यक्ति राजा संसार चंद के संरक्षण में अपने उत्कर्ष पर पहुँची।इसकी कोमल रेखाएँ,सूक्ष्म तूलिका-कार्य,रंगों का संतुलित प्रयोग,प्राकृतिक दृश्यों का मनोहारी चित्रण तथा मानवीय भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति इसे विश्व की श्रेष्ठ चित्रकला परंपराओं में स्थान प्रदान करती है।राज्यपाल ने कहा,आज पारंपरिक कला रूपों के संरक्षण और पुनर्जीवन की आवश्यकता पहले से अधिक है।संरक्षण का अर्थ केवल पुरानी कलाकृतियों को सुरक्षित रखना नहीं,बल्कि उन कलाकारों,शिल्पकारों और समुदायों को भी सशक्त बनाना है जो इन परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।इस दिशा में संस्थानों,सरकारों,विद्वानों,कलाकारों और स्थानीय समुदायों को मिलकर कार्य करना होगा।

श्री गुप्ता ने कहा कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी आर्थिक समृद्धि से नहीं,बल्कि उसकी सांस्कृतिक गुणवत्ता और रचनात्मक चेतना से होती है।उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल चित्रों का प्रदर्शन नहीं,बल्कि भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है।

इससे पूर्व,भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो.हिमांशु चतुर्वेदी ने राज्यपाल का स्वागत किया तथा संस्थान के ऐतिहासिक महत्व से अवगत करवाया।उन्होंने कहा कि यह संस्थान कला,संस्कृति और भाषा क्षेत्र में अग्रणी तौर पर कार्य कर रहा है।उन्होंने कहा कि मूल कलाओं को संरक्षित करने के उद्देश्य से इस पांच दिवसीय कला शिविर का आयोजन किया गया।उन्होंने इस अवसर पर राज्यपाल को सम्मानित भी किया।वरिष्ठ चित्रकार धनीराम ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।पुस्तकालय अध्यक्ष एवं अकादमिक संसाधन अधिकारी डॉ.राजीव मिश्रा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।बाद में,राज्यपाल ने संस्थान परिसर में चिनार का पौधा भी रोपा।हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रामेश्वर सिंह ठाकुर तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

